वकील ने बनाई फर्जी कोर्ट, केस लगाकर करी कई लोगों से धोखाधड़ी

इंदौर आरोपी वकील, गिरिराज गुप्ता, ने कलेक्टर कार्यालय से जुड़े एसडीएम के नाम पर फर्जी आदेश तैयार किया। उसने एसडीएम के फर्जी हस्ताक्षर और सील का इस्तेमाल करके एक नकली दस्तावेज तैयार किया, जिसे वह अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए इस्तेमाल करने की योजना बना रहा था। वकील ने फरियादी से मोटी रकम वसूलने के बाद इस फर्जी आदेश का उपयोग करते हुए भाड़ा नियंत्रक कोर्ट में एक फर्जी प्रकरण दर्ज करवा दिया। यह पूरी प्रक्रिया असल में एक धोखाधड़ी थी, जिसका उद्देश्य फरियादी को ठगना और पैसे ऐंठना था। जब फरियादी को संदेह हुआ, तो उसने खुद एसडीएम कार्यालय जाकर जांच की। कार्यालय में जांच के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि जो आदेश उसे वकील द्वारा दिखाया गया था, वह पूरी तरह से फर्जी था। यह धोखाधड़ी और जालसाजी का खुलासा हुआ। फरियादी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपी वकील गिरिराज गुप्ता के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई। पुलिस ने इस धोखाधड़ी के मामले में कार्रवाई शुरू की और वकील को गिरफ्तार करने के लिए तलाशी अभियान चलाया। प्रशासन और पुलिस ने इस मामले की गहराई से जांच शुरू की है। जांच में यह देखा जा रहा है कि क्या आरोपी वकील अकेला था, या इस मामले में किसी और की भी संलिप्तता थी। पुलिस अन्य लोगों की भूमिका को लेकर भी जांच कर रही है, जो इस धोखाधड़ी में शामिल हो सकते हैं। आरोपी ने जो एसडीएम के नाम पर आदेश तैयार किया, उसमें फर्जी हस्ताक्षर और सील का इस्तेमाल किया था। इससे यह साबित होता है कि वकील ने सरकारी दस्तावेजों और प्रमाणों को गलत तरीके से बदलकर धोखाधड़ी की इस धोखाधड़ी का मुख्य उद्देश्य फरियादी से मोटी रकम वसूलना था। वकील ने अदालत के आदेश का ढोंग रचकर फरियादी को कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बनवाया, जिससे उसने पैसे ऐंठने का प्रयास किया।

इस मामले में वकील गिरिराज गुप्ता पर कानूनी कार्रवाई की जा रही है, और उसे सजा दिलाने के लिए सबूतों का संकलन किया जा रहा है। धोखाधड़ी और जालसाजी के आरोपों के तहत उसकी गिरफ्तारी और कड़ी सजा की प्रक्रिया चल रही है।

यह घटना न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को प्रभावित करने वाली है। प्रशासन और पुलिस इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं और भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए अधिक सख्त कदम उठाने पर विचार कर रहे हैं।

यह मामला इस बात का उदाहरण है कि कैसे कुछ लोग कानूनी व्यवस्था का दुरुपयोग कर सकते हैं। इससे समाज को यह सीख मिलती है कि किसी भी कानूनी प्रक्रिया को स्वीकार करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करना जरूरी है।

इस पूरे मामले से यह साबित होता है कि किसी भी कानूनी दस्तावेज की वैधता की पुष्टि करना बेहद जरूरी है, ताकि इस प्रकार की धोखाधड़ी से बचा जा सके।

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